सोरायसिस एक ऑटोइम्यून त्वचा रोग है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली त्वचा की कोशिकाओं को आवश्यकता से अधिक तेजी से बनाने लगती है। इसी कारण चमड़ी मोटी हो जाती है, उस पर परत जमती है, खुजली होती है और बार बार त्वचा फटने से दर्द होता है। भोजन से लक्षण बढ़ना यह दर्शाता है कि आंतरिक सूजन और पाचन अग्नि की गड़बड़ी भी इसमें मुख्य भूमिका निभा रही है।
आयुर्वेद में इसे किटिभ कुष्ठ या एककुष्ठ के अंतर्गत माना गया है। इसमें वात और कफ दोष की प्रधानता के साथ रक्तदूषण होता है। वात दोष से त्वचा का फटना और दर्द, कफ दोष से मोटापन और परत बनना तथा दूषित रक्त से खुजली और जलन होती है
Kayakalpa Vati -दिन में दो बार भोजन के बाद गुनगुने पानी से
Neemghan Vati -दिन में दो बार भोजन के बाद
Mahamanjistadi Arishta 15 ml बराबर पानी मिलाकर दिन में दो बार भोजन के बाद
Kayakalpa Taila प्रभावित स्थान पर दिन में एक बार या आवश्यकता अनुसार हल्के हाथ से लगाएँ
अत्यधिक रगड़ना या खरोंचना न करें
बहुत गर्म पानी से स्नान से बचें
आहार में विशेष सावधानी आवश्यक है क्योंकि आपके केस में भोजन से फ्लेयर बढ़ रहा है।
दही, पनीर,खट्टा,अधिक मिर्च मसाले,बासी भोजन,मैदा, बेकरी आइटम,तला हुआ और प्रोसेस्ड फूड,शराब और धूम्रपान इनसे परहेज़ रखें
सादा घर का ताजा भोजन ,मूंग दाल
लौकी, तोरी, परवल, तिंडा
पुराना चावल, थोड़ी मात्रा में घी
गुनगुना पानी को शामिल करें
मानसिक तनाव भी सोरायसिस को बढ़ाता है, इसलिए ,रात की नींद पूरी लें
प्रतिदिन 15 मिनट अनुलोम विलोम और भ्रामरी प्राणायाम करें
नियमित औषधि, सही आहार और संयमित जीवनशैली से 1-3 महीनों में
खुजली में कमी
त्वचा का फटना कम होना
जैसे स्पष्ट सुधार दिखने लगते हैं।